अमेरिका ने चीन से अलग होना शुरू कर दिया है, भारत को कम नुकसान हो इस पर मोदी सरकार को काम करना चाहिए
अमेरिका ने चीन से अलग होना शुरू कर दिया है, भारत को कम नुकसान हो इसपर मोदी सरकार को काम करना चाहिए

भारत ही नहीं बल्कि कई और देशों का चीन से अलगाव निश्चित है. चीन जिस तरह एक केंद्रीय खिलाड़ी और दुनिया की फैक्टरी के रूप में उभरा और इसके चलते विश्व अर्थव्यवस्था का जिस तरह गहरा एकीकरण हो गया उसके मद्देनज़र कई लोग यह मानने लगे थे कि चीन से अलगाव असंभव है या कम-से-कम अविश्वसनीय तो है ही. लेकिन जैसा कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने हाल में कहा, अब इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है.
उन्मादी और तानाशाह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) और शी जिंपिंग सरकार चीनी जनता पर और चीन से बाहर की दुनिया पर भी अपनी जकड़ जितनी मजबूत करने की कोशिश करेगी, चीन से अलगाव की प्रक्रिया उतनी ही तेज होगी.
भारत की भूमिका
भारत की नीति ने इस प्रक्रिया को गति दी है. उसने जब 59 चीनी ऐप्स पर रोक लगा दी तो दूसरे देशों ने भी ऐसा ही किया. लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार इन कदमों को लद्दाख में चीन की नाकाबिले बर्दाश्त हरकतों के जवाब के तौर पर देखती है. ऐसा लगता है कि मोदी सरकार यह नहीं देख रही है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक शीतयुद्ध या कुछ चीनी जानकारों के मुताबिक, एक ‘नरम युद्ध’ की ओर बढ़ रही है.
जो भी हो, यह तो निश्चित है कि इस प्रक्रिया के कारण विश्व अर्थव्यवस्था का एक नया ढांचा उभरने वाला है, जो कि पिछले तीन दशकों में इसके ढांचे से अलग होगा. इन बदलावों को स्वीकार करते हुए भारत को केवल कुछ चीनी ऐप्स और कुछ आपत्तिजनक निवेशों पर रोक लगाने से ज्यादा कुछ करना होगा. भारतीय नीति इस तथ्य के मद्देनज़र तय करनी होगी कि विश्व अर्थव्यवस्था में अभी विच्छेद की जो प्रक्रिया चल रही है वह बहुत दूर तक जाएगी और इससे भारत और पूरी दुनिया प्रभावित होगी.
विश्व अर्थव्यवस्था एकजुट क्यों हुई थी
विच्छेद अवश्यंभावी है क्योंकि जोड़ने की राजनीति अंतरराष्ट्रीय होड़ और टकराव का एक विशेष तत्व भी है. विडंबना यह है कि इस नये ‘नरम युद्ध’ के तहत सभी मसलों को सुरक्षा तथा राजनीतिक होड़ से जोड़ने में ही विच्छेद की प्रक्रिया के सूत्र जुड़े हैं. आखिर, सभी देश अपनी सुरक्षा के मसलों को आर्थिक मसलों से ज्यादा तरजीह देते हैं क्योंकि सुरक्षा न हो तो संपदा बनाने का कोई मतलब नहीं है. इसलिए जब मुसीबत आन पड़ी हो तब सुरक्षा की राजनीति को अर्थव्यवस्था से ज्यादा अहमियत दी जाती है.
फिलहाल विश्व अर्थव्यवस्था के एकीकरण का आधार यह धारणा है कि आर्थिक मसले और सुरक्षा के मसले लगभग एक-दूसरे से अलग हैं. और ऐसा लगता है कि यह धारणा लंबे समय से कायम इस अंतरराष्ट्रीयतावादी सपने से जुड़ी इस मान्यता पर आधारित है कि आर्थिक प्रोत्साहनों से राजनीतिक समीकरणों को बदला जा सकता है और इससे फिर और ज्यादा जुड़ाव बनता है जो राष्ट्रहित के आकलनों को बदल देता है. कहने की जरूरत नहीं कि यह अपेक्षा तब भी मूर्खतापूर्ण साबित हुई थी जब पहली बार यह प्रथम विश्वयुद्ध की तैयारी के साथ की गई थी और अब चीन के तौर-तरीके के मामले में भी साबित हो रही है.
परेशान चीन किसी को दोष नहीं दे सकता
अब भारी अलगाव की आशंका ने चीनी नेतृत्व को बेचैन कर दिया है. उसके विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है कि अमेरिका और चीन को ‘अलगाव की प्रक्रिया रोक देनी चाहिए और आपसी सहयोग से रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहिए.’ और अमेरिका में चीन के राजदूत कुई त्यंकई ने चेतावनी दी है कि उनके रिश्ते ‘नाजुक मोड़’ पर पहुंच गए हैं. भारत में चीन के राजदूत सन वीडोंग ने भी भारत को चेतावनी दी है कि ‘जबरन अलगाव धारा के विपरीत जाना होगा और इससे ‘घाटा-ही-घाटा’ होगा.’
लेकिन इस बदलाव के लिए तो चीन ही जिम्मेदार है. उसने अपनी आर्थिक ताकत का बार-बार इस्तेमाल करके दूसरे देशों को नुकसान पहुंचाया और इन पर अपनी मनमर्जी चलाई. आर्थिक दबाव की चीनी चाल ‘नया सामान्य नियम’ बन गई है. आर्थिक जुड़ाव का बार-बार राजनीतिक फायदा उठाने के बाद चीन अगर अलगाव के लिए दूसरों को दोष दे रहा है तो यह उसकी ज्यादती ही है. दरअसल, चीन ने उनके लिए कोई रास्ता छोड़ा ही नहीं है. उसने न केवल अपनी आर्थिक ताकत का बेशर्मी से इस्तेमाल किया बल्कि घरेलू सब्सिडी, करों और कमजोर क़ानूनों के अलावा अपने यहां कम वेतन के कारण स्वतः हासिल बढ़त आदि गलत तरीकों के बूते अपनी ताकत बढ़ाता रहा.
अलगाव से सबको नुकसान, तो क्या हुआ?
ध्यान रहे कि अलगाव का मतलब चीन से पूर्ण आर्थिक तलाक नहीं है. इस मामले में, शीतयुद्ध के दौरान द्विपक्षीय होड़ एक अपवाद थी. उस समय सुरक्षा के मामले में जबरदस्त होड़ के बावजूद, महाशक्तियों के बीच इससे पहले हुई प्रतिद्वंदिता में इस तरह का आर्थिक संबंध विच्छेद नहीं हुआ था. अब इतिहास खुद को दोहरा सकता है लेकिन ठीक वैसा ही हो यह मुमकिन नहीं. अब उभरता शीत युद्ध इन पुराने मॉडलों के बीच की चीज़ दिख सकती है लेकिन यह वैसा नहीं होगा जैसा विश्व युद्ध-1 के पहले था. आर्थिक मेलजोल शीत युद्ध काल में जिस स्तर का था उससे ऊंचे स्तर पर रह सकता है मगर वह विश्व युद्ध-1 के पहले वाले स्तर से काफी निचले स्तर पर रह सकता है.
इसमें कोई संदेह नहीं है कि अलगाव भारत या चीन के लिए न तो आसान रहने वाला है और न ही कम नुकसानदेह रहने वाला है. बल्कि यह बात विश्व स्तर के लिए भी लागू हो सकती है. पिछले दो दशकों में चीन की प्रगति ने उसे ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को भी अमीर बनाया है. इसीलिए, अलगाव से चीन ही नहीं बल्कि हर किसी को नुकसान होगा. ऐसे अफसोसनाक नतीजे के बावजूद अलगाव न हो इसकी संभावना कम है. और यह केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा.
उम्मीद रखनी चाहिए कि यह दूसरे क्षेत्रों में भी होगा यानि बहुपक्षीय और द्विपक्षीय संबंधों में भी. लेकिन यह भी निश्चित है कि आर्थिक क्षेत्र की तरह इन दूसरे क्षेत्रों में भी पूर्ण अलगाव नहीं होगा. लेकिन सक्रिय सहयोग और तालमेल मुश्किल होता जाएगा, चाहे भारत ‘आपसी समझदारी’ कायम करने की ख़्वाहिश क्यों न रखता हो. इस निश्चित नतीजे से बचने की उम्मीद पालने से बेहतर यही है कि इसके मद्देनज़र खुद को तैयार किया जाए.
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